मृदा अपरदन के कारक - Soil Erosion Factors (GK in Hindi - Samanya Gyan) - 766

Posted on: December 27th, 2020 Category: GK Questions


मृदा अपरदन के कारक


  • वृक्षों का अविवेकपूर्ण कटाव
  • वानस्पतिक फैलाव का घटना
  • वनों में आग लगना
  • भूमि को बंजर/खाली छोड़कर जल व वायु अपरदन के लिए प्रेरित करना|
  • मृदा अपरदन को त्वरित करने वाली फसलों को उगाना
  • त्रुटिपूर्ण फसल चक्र अपनाना
  • क्षेत्र ढलान की दिशा में कृषि कार्य करना|
  • सिंचाई की त्रुटिपूर्ण विधियाँ अपनाना

1. जलीय अपरदन (Fluvial Erosion) -
जल द्वारा मिट्टी के घुलनशील पदार्थों को घुला कर बहा ले जाना घोलीकरण (Solution) या जलकृत अपरदन (Corrosion) कहलाता है । जल की चोट से मिट्टी का स्थानान्तरण जलगति क्रिया (Hydraulic Action) कहलाता है । जल कई रूपों में मृदा-अपरदन का कार्य करता है। इनमें प्रमुख है - चादर अपरदन, नलिका अपरदन, अवनालिका अपरदन आदि।

2. सागरीय अपरदन - सागर की लहरें तट से टकराकर चट्टानों का अपक्षय करती हैं । सागरीय जल के विभिन्न विक्षोभों में सर्वाधिक अपरदन लहरों (Waves) द्वारा होती है । ज्वार; (Tide) से भी अपरदन होता है । समुद्र की सतह पर लहरों द्वारा तय की गयी दूरी फेच (Fetch) कहलाती है । फेच जितना अधिक लम्बा होता है, समुद्री अपरदन उतना अधिक तीव्र होता है । भारत में लहरों द्वारा सर्वाधिक अपरदन केरल के पश्चिमी तट तथा महराष्ट्र तट पर होता है । समुद्री अपरदन से बचने के लिए केरल सरकार ने तट के सहारे ग्रेनाइट दीवाल (Granite Wall) का निर्माण कराया है ।

3. वायु अपरदन - (Wind Erosion) - तीव्र पवनों के प्रभाव से सूक्ष्म कणों का उड़ाया जाना अपवाहन ;(Dflation) कहलाता है। मृदा-अपरदन चक्रवातों द्वारा भी होता है, जिसमें चक्रवात मिट्टी को उड़ाकर छोटे गर्त बना देते हैं, जिन्हें धूलि का कटोरा ;(Dust Bowl) कहा जाता है । भारत में मई तथा जून माह में रबी की फसलों की कटाई के पश्चात् सतलज-गंगा-ब्रह्मपुत्र मैदान की उपजाऊ मिट्टी का भी पवन द्वारा पर्याप्त मात्रा में अपरदन होता है

4. हिमानी अपरदन (Glacial Erosion):- हिमालय में हिमरेखा के नीचे बहने वाले बर्फ तथा जल को हिमनद;(Glacier) कहा जाता है। ये चट्टानों तथा मिट्टी को काटकर निचली घाटी में जमा कर देते हैं, जिन्हें हिमोढ(Moraine) कहा जाता है ।

5. निर्वनीकरण (Deforestation):- निर्वनीकरण द्वारा मृदा-अपरदन में वृद्धि होती है, क्योंकि वन मिट्टी को अपरदित होने से निम्न रूपों में बचाते हैं -
1. जड़ों द्वारा अपरदन पर नियंत्रण कर,
2. पत्तियों द्वारा बूँदाघात अपरदन ;(Splash erosion) के नियंत्रण द्वारा तथा
3. भूमि पर गिरी पत्तियों द्वारा धरातलीय प्रवाह की गति में कमी तथा अपवाहन (Deflation) की दर को कम करके । निर्वनीकरण के द्वारा देश में सर्वाधिक मृदा-अपरदन पश्चिमी घाट क्षेत्र में, शिवालिक पर्वत वाले क्षेत्र में तथा उत्तरी-पूर्वी राज्यों में होता है । उत्तरी-पूर्वी राज्यों में झूम खेती (Shifting Cultivation) के कारण भी मृदा-अपरदन की दर अधिक है ।

6. जुताई -
ढाल के अनुद्धैर्य जुताई से वर्षा का जल तेजी से नलिका तथा अवनलिका का विकास कर उपजाऊ मिट्टी बहा ले जाता है ।


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