मृदाएं (Soils)-2 Important Note for Exam (GK in Hindi - Samanya Gyan) - 789

Posted on: December 27th, 2020 Category: सामान्य ज्ञान हिन्दी - Short Notes in Hindi


मृदाएं (Soils)


लैटेराइट मृदा :--


इसके अन्तर्गत करीब तीन लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र आता है । यह मृदा भारत के उन क्षेत्रों में पायी जाती है, जहाँ निम्नलिखित भौगोलिक विशेषताएँ पायी जाती हैं । प्रथमतः लैटराइट चट्टान का होना आवश्यक है । दूसरा उस प्रदेश का मौसम वैकल्पिक हो अर्थात आर्द्र और शुष्क मौसम वैकल्पिक रूप से आते रहें ।
भारत में यह मृदा मुख्यतः केरल, सह्याद्रि पर्वतीय क्षेत्र, पूर्वी घाट, पर्वतीय उड़ीसा, बिहार और मध्यप्रदेश के पठारी क्षेत्र, गुजरात के पंचमहल जिला और कर्नाटक के बेलगाँव जिला में प्रधानता से पायी जाती है । इस मृदा का सर्वाधिक क्षेत्र केरल में है ।
इसमें एल्युमिनियम और लोहा की प्रधानता होती है । इसमें ह्यूमस का निर्माण तो होता है, लेकिन मृदा के उपरी सतह पर इसकी कमी रहती है। वस्तुतः यह उपजाऊ मृदा की श्रेणी में नहीं है । लेकिन यह जड़ीय फसल ;तववज बतवचद्ध जैसे - मुंगफली के लिए विशेष रूप से उपयोगी है । भारत की अधिकतर मूंगफली इसी मृदा में होती है । यह मृदा काजू की कृषि, रबर, काॅफी और मसाले, तेजपात की कृषि के लिए भी अनुकूल है । टोपायका जैसे मोटे खाद्यान्न इसी मृदा पर उत्पन्न किये जाते हैं । आधुनिक कृषि संरचनात्मक सुविधाओं की मदद से इस मृदा को अधिक उर्वरक बनाने पर जोर दिया जा रहा है ।

वनीय मृदा :--


वनीय मृदा दो लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में पाई जाती है । यह मृदा मुख्यतः पूर्वोत्तर भारत, शिवालिक पहाड़ी और दक्षिण भारत के पर्वतीय ढ़ालों पर पायी जाती है । इस मृदा की परत पतली होती है। इसके उपरी सतह पर जैविक पदार्थ बहुलता से होते हैं । यह मृदा बागानी फसलों के अनुकूल है । भारत के अधिकतर बागानी फसल (चाय, रबर) इसी मृदा पर उत्पन्न होती है । पूर्वोत्तर भारत तथा शिवालिक क्षेत्र में झूम कृषि और सीढ़ीनुमा कृषि भी मुख्यतः इसी प्रकार की मृदा पर होती है ।
यह मृदा क्षरण की गंभीर समस्या से ग्रसित है । कंटूर फार्म विकसित कर इस मृदा को अधिक से अधिक उपयोगी बनाने का प्रयास किया जा रहा है । कर्नाटक, असम और मेघालय में इस मृदा के उपर बांस की बागानी कृषि, कर्नाटक, केरल, अण्डमान-निकोबार द्वीपसमूह और त्रिपुरा में इसी मृदा के उपर रबर की बागानी कृषि बहुलता से की जाती है ।

लवणीय एवं क्षारीय मृदा :--

इसके अंतर्गत 1.42 लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र आता है । यह मृदा अंतःप्रवाह क्षेत्र की विशेषता है। इसे ‘पलाया मृदा’ भी कहा जाता है । मरुस्थलीय प्रदेश के पलाया, जलोढ़ और बलुही क्षेत्र में इसकी प्रधानता है । भारत में राजस्थान के लूनी बेसिन, सांभर झील के क्षेत्र तथा दक्षिणी-पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई छोटे-छोटे बेसिन में यह मृदा विकसित हुई है । मैदानी भारत में भी यह कहीं-कहीं पाई जाती है । इसे ‘रेह’ अथवा ‘ऊसर मृदा’ भी कहा जाता है । इसमें लवण, बालू और क्ले की प्रधानता होती है । वर्षा होने के बाद सतह के लवण घुलकर नीचे चले जाते हैं । लेकिन ज्योंही वाष्पोत्सर्जन की प्रक्रिया तीव्र होती है, लवण पुनः उपरी सतह पर आ जाते हैं । क्षारीय मृदा में भी लवण की प्रधानता होती है, लेकिन इसमें सोडियम क्लोराइड अधिक होते हैं, जो जल्दी से घुलकर सतह के नीचे नहीं जाते हैं ।भारत का यह मृदा क्षेत्र कृषि के लिए प्रतिकूल क्षेत्र है । इसमें नमी की भारी कमी होती है। लेकिन नवीन कृषि नीति के अंतर्गत ऐसे अंतःप्रवाह क्षेत्र से जल के बाहरी निकास का प्रयास किया जा रहा है। जल के निकास से वाष्पोत्सर्जन का प्रभाव कम होगा और इससे लवण का स्तर धीमी गति से सतह पर आने लगेगी । पुनः लवण का स्तर सतह पर आये, इसके पूर्व ही यदि ड्रिप सिंचाई की व्यवस्था हो जाये, तो लवण को नीचे की स्तरों पर रखा जा सकता है । यह परिस्थिति सब्जी, फल और फूल की कृषि के लिए अनुकूल होती है । राजस्थान एग्रीकल्चर मार्केटिंग बोर्ड द्वारा लवणीय मृदा के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे हैं । इसी विकास कार्यों के परिणामस्वरूप राजस्थान इन फसलों का अग्रणी उत्पादक हो गया है ।

मरुस्थलीय मृदा :--

भारत की यह मृदा एक लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र के अंतर्गत आती है । यह अरावली पर्वत के पश्चिमी राजस्थान की विशेषता है । इसके अंतर्गत लवण और बालू की प्रधानता होती है । फास्फेट खनिज भी पर्याप्त मात्रा से पाये जाते हैं । लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या नमी की कमी है । लेकिन जब वर्षा ऋतु में नमी की उपलब्धता होती है, तो यह मृदा मोटे अनाजों के लिए अनुकूल हो जाती है । भारत का अधिकतर बाजरा इसी मृदा पर उत्पन्न किया जाता है । वर्तमान समय में इस मृदा का उपयोग चारे की कृषि तथा कई प्रकार के दलहन की कृषि के लिए किया जाता है ।

पिट अथवा जैविक मृदा :--

इसके अंतर्गत भारत का करीब 1) लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र आता है । यह मृदा उर्वरक मृदा की श्रेणी में नहीं आती । यह डेल्टाई भारत की विशेषता है । इसके अतिरिक्त भारत के अन्य क्षेत्र हैं - केरल का एलप्पी जिला तथा उत्तरांचल का अल्मोड़ा जिला । इस मृदा में क्ले की प्रधानता होती है । ज्वारीय प्रभाव से यह अक्सर जलमग्न होती रहती है । अतः इसके क्ले मृदा में नमी और लवण की कमी नहीं होती । लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें ह्यूमस का अंश गौण होता है, क्योंकि लवणयुक्त इस मृदा में सूक्ष्म जीवों का विकास नहीं हो पाता । सूक्ष्म जीवों के अभाव में ह्यूमस का निर्माण नहीं होता । यही कारण है कि इस मृदा में उर्वरक गुणों की कमी है । इसके व्1 स्तर में पत्ते, लकडि़यों तथा जड़ के टुकड़े पाये जाते हैं, जो मृदा की उपरी सतह पर जैविक पदार्थों की बहुलता रखते हैं । लेकिन व्2 स्तर में ह्यूमस के बदले लकड़ी और पत्तों के टुकड़े पाये जाते हैं । इसी कारण जलोढ़ और तटीय मृदा होने के बावजूद यह भारत की उपजाऊ मृदाओं की श्रेणी में नहीं है ।





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